10 July 2015

ज़रा रुको तो सही

दौड़ रहें  हैं हम सब ,
बचपन से लेकर अब तक।
क्षण भर रुको तो जरा ,
देखो प्रकृति की  छटा।
कितनी मनहर , कितनी निराली ,
चारों तरफ है हरियाली।

फुर्सत के पल ,
बीती कहानी से गए ढल।
ठहरो थोड़ा सा ,
महसूस करो बहती हवा।
शीतलता , मंद बयार की ,
हलकी - हलकी फुहार सी।

जिंदगी तो ढलती जाएगी ,
कभी भी सुकून न पायेगी।
तब अपने मन में झांको ,
ढूंढो उन मासूम पलों को ,
जब स्वछन्द विचरते थे ,
बिना किसी फ़िक्र यूँ ही बहते थे।

ज़रा रुको तो सही.…………………………………

3 comments:

  1. रुको जरा --- भागते जीवन को सचेत करती और प्रक्रति के प्रति जोड़ने का सार्थक सन्देश देती सुंदर रचना ---
    बधाई

    आग्रह है मेरे ब्लॉग में भी सम्मलित हों
    ख़ास-मुलाक़ात


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  2. Where is peace... i wonder... in rest or in strife...

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  3. all credits to you: http://gazalbharadwaj.blogspot.in/
    :) thanks

    ReplyDelete

आभार है मेरा

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