27 अक्तूबर 2015

इन पहाड़ों से




इन पहाड़ों से मेरा कुछ अनोखा नाता है ,
इन्हीं का साथ मुझे हर दम सुहाता है। 

अडिग, अखंड, पहाड़ों की छवि मन में उकेरित है ,
न जाने कितने मेरे स्वपन इन पहाड़ों से प्रेरित  हैं। 

पहाड़ी धुन का राग  मन गुनगुनाता है ,
पहाड़ों की सुंदरता में ही जीवन समाता  है। 

अथाह कल्पनायें पनपती इन वादियों में ,
ज्यूँ मद्धम - मद्धम धूप खिले सर्द जाड़ों में। 

पहाड़ बुलाते हैं मुझे हर क्षण ,
ऐसा प्रतीत होता है ,
शायद कुछ मरण - जन्म का  इनसे समझोता है।  

10 जुलाई 2015

ज़रा रुको तो सही

दौड़ रहें  हैं हम सब ,
बचपन से लेकर अब तक।
क्षण भर रुको तो जरा ,
देखो प्रकृति की  छटा।
कितनी मनहर , कितनी निराली ,
चारों तरफ है हरियाली।

फुर्सत के पल ,
बीती कहानी से गए ढल।
ठहरो थोड़ा सा ,
महसूस करो बहती हवा।
शीतलता , मंद बयार की ,
हलकी - हलकी फुहार सी।

जिंदगी तो ढलती जाएगी ,
कभी भी सुकून न पायेगी।
तब अपने मन में झांको ,
ढूंढो उन मासूम पलों को ,
जब स्वछन्द विचरते थे ,
बिना किसी फ़िक्र यूँ ही बहते थे।

ज़रा रुको तो सही.…………………………………

29 जून 2015

तेरा ही नाम

सोते- जागते बस तेरा ही नाम लेती हूँ ,
जब डरती हूँ काली रात से,
तब तेरा ही नाम लेती हूँ। 

बादलों की चादर से छन के आये बारिश ,
भिगो दे मेरी हर ख्वाहिश,
पर हर ख्वाहिश की तकदीर में मैं,
तेरा ही नाम लिख देती हूँ। 



जन्म, पुनर्जन्म होते हैं क्या ?
मुझे नहीं पता। 
यदि होते हैं तो,
हर जन्म में तेरे ही नाम अपना यह जीवन लिख देती हूँ। 

कोई कुछ कहता नहीं मुझसे,
न ही कुछ पूछता है,
क्यूंकि जवाब में मैं,
तेरा ही नाम कह देती हूं,
सोते- जागते बस तेरा ही नाम लेती हूँ । 


27 जून 2015

नीलकंठ त्रिपुरारी


नीलकंठ त्रिपुरारी,
तेरी छवि निराली।

त्रिशूल हाथ में धरा,
हरे सबकी व्यथा।

गंगा को लपेटे,
कष्ट सभी के पी लेते। 

सर्प माला से सुसज्जित,
करते सभी का हित्त। 

नंदी की है सवारी,
समग्र सृष्टि तुम्हें प्यारी। 

मुण्डमाल की लड़ियाँ,
मुक्त करें मोहमाया की कड़ियाँ। 

चंदा का आभूषण,
चमके  हर क्षण - क्षण। 

शक्ति है अर्धांगिनी,
सदैव आपकी संगिनी। 

नीलकंठ त्रिपुरारी,
तेरी छवि निराली।


21 जून 2015

चाँद की शीतलता

चंदा इक ओर  बैठा,
आकाश में ,
टुकुर- टुकुर निहारे धरती को प्रकाश से,
पर यह प्रकाश उसने उधार लिया है सूर्य से,
फिर भी देखे इक टक सम्पूर्ण धैर्य से। 

गर्वान्वित हो सूर्य चमके,
ओर भी गर्माहट से ,
त्राहि - त्राहि  करे धरती उसकी हर आहट पे,
द्वेष, क्रोध, जलन का परिवेश निराला है,
जिसने भी पिया उसका ह्रदय ज्वलनशील ज्वाला है । 

वहीँ चंदा की शीतलता,
अनोखी है , शांत है,
पृथवी उसकी ठंडक में नितांत हैं। 

बने हम भी चाँद की ठंडक सा,
                   बहें मंद - मंद हवा की सुगंध सा ................... 





20 जून 2015

अगर तुम मेरे होते.........................

जीवन की कड़वाहट भी मैं पी लेती,
इस जहां के दर्द सह जाती,
काँटों से भी लिपट जाती,
अगर तुम मेरे होते। 

तुम्हारी पीड़ा को हर लेती,
अपने श्वांस में उसे भर लेती,
स्नेह की छाया कर देती,
अगर तुम मेरे होते। 

मेरी कविताओं को अर्थ मिल जाता,
भटकती हुई भावनाओं को,
स्पर्श मिल जाता,
अगर तुम मेरे होते। 

तुम्हारी यादों में,
एक नदिया की तरह बह रही हूँ ,
मुझे महासागर मिल जा जाता ,
अगर तुम मेरे होते। 


04 जून 2015

पृथ्वी की धुरी

चिर काल से निरंतर चल रही है,
एक ही समय चक्र की ताल पे,
कभी न रुके , कभी न सोये,
चलती रहे एक ही ताल पे। 

 ब्रह्मांड की कुंडलियों में,
असंख्य तारों के झुरमुटों में,
छिपी है इसकी कहानी,जो कहती है सबसे,
कि चल रही है धरा एक ही ताल पे। 



सौरमंडल चमकता है,
सूर्य के प्रकाश से,
जीवन की धारा बहती है पृथ्वी के प्रवाह से,
और चल रही है यह एक ही ताल पे। 

कहते हैं नीली चादर सी बिछी हुई,
दिखती है ब्रह्माण्ड से,
प्रकृती की गोद समाई  है इसी पर,
चल रही है जो एक ही ताल पे। 

26 मई 2015

क्या कभी ?

क्या कभी इंसान,
माप सकेगा एक बच्चे के, 
होंठों की मुस्कान ?

पहुँच चुका है इंसान,
चाँद , मंगल और गगन अविराम,
पर क्या कभी पहुंचेगा,
सच की गहराई में उसका विमान ?

बना रहे हैं आज हम ,
ऊँची -ऊँची ईमारतें,
बाँध रहें हैं दरिया का प्रवाह।

पर कब बांधेंगे हम,
समाज की खोखली जड़ों का प्रभाव ?
क्या कभी दुनिया पुनः ,
बनेगी सुख का परिणाम ?




20 मई 2015

भोर का तारा



भोर का तारा,
झांकें बादलों से संसार सारा। 
कहीं उसे दिखे,
सुख की अभिलाषा,
और कहीं दुःख की भाषा।

स्वयं उसका मन भी,
संताप से है परिपूर्ण,
चूर -चूर  है,
उसका अस्तित्व संपूर्ण। 


बादलों में छुपा है इक ओर,
टूट रही है उसके सपनों की डोर। 
कहे भी तो क्या कहे,
और करे भी तो क्या करे। 

जैसे ही चाँद डूबे और सूरज चमके,
रह जाता है भोर का तारा छुपके। 
उसकी संवेदना कोई क्या जाने,
हालाँकि पूर्ण जगत उसको माने। 


उसकी पीड़ा की गहराइयाँ अनंत हैं ,
छूना चाहूँ मैं उस भोर के तारे को,
क्या मैं परिपक्व कर पाऊँगी उसके जीर्ण सहारे को ?

वह भोर का तारा,
जो है सबसे नयारा। 

09 अप्रैल 2015

आज मैं नि:शब्द हूँ


आज मैं नि:शब्द हूँ
त्रस्त और स्तब्ध हूँ  

भिन्न भिन्न सवाल हैं

और कई बवाल हैं  

उठ  रहा तूफ़ान है 
गिर रहा मचान है  


क्यूँ दुःख हैं जीवन में ?
क्यूँ  सुख अनजान है ?

मोह माया से परास्त क्यूँ,
यह पूरा संसार है?

दे हमें मोक्ष तू ,
और मुक्ति की कामना  

कर हमारी दूर तू, 
यह सारी  यातना  

  
आज मैं नि:शब्द हूँ
त्रस्त और स्तब्ध हूँ 

02 मार्च 2015

वसंत बहार - होली की फुहार


हर तरफ रंगों की रंगोली है,
मन में ख़ुशी की लहर,
और दिल में प्रसन्नता की डोली है। 

प्रकृति के असंख्य रंग,
खिलें हैं हर्ष के संग,
और उड़ रहा है मन हवा के संग। 

पंछियों का कोलाहल,
एक मधुर राग है,
चहुँ ओर छाया रंग है,चाहे आकाश हो या भूतल। 

खो जाऊं इन रंगों में, 
वसंत की फुहारों में,
कहीं झूलें, तो कहीं ठिठोली,
यही तो है खुशियों की होली। 




होली के रंग कान्हा के संग

वृन्दावन की गलियों में,
रंग- बिरंगी कलियों में,
गूंजे तुम्हारी बांसुरी,
हे! कान्हा तुम्हारे नाम की मैं बाँवरी। 

होली यह जो आई है,
रंगों की फुहार लाई है,
तेरे रंग में रंगने को, 
हे! कान्हा मन में लगन समाई है।




हर रंग में सुर तुम्हारा समाया है,
कठिन वक्त में तुमने ही तो दिया सहारा है,
होली के लाल गुलाल सा,
हे! कान्हा तेरा रूप है विशाल सा। 

आज रंग जाऊंगी रंगो में,
छनकती हुई तरंगो में,
हर बुराई मिट जाएगी,
हे! कान्हा यह दुनिया तेरे रंग में निखर जाएगी।  
 

16 फ़रवरी 2015

जय महाकाल


कैलाश के विहारी ,
समग्र दुनिया तुमको प्यारी,
तुझे कोटि - कोटि प्रणाम,
तुम ही देते अनाम को नाम। 

सर्पमाला से सुसज्जित,
करते सब का हित,
तुझे कोटि - कोटि प्रणाम,
तुम में समाये चारों धाम। 

चन्द्रमा को मान दिया,
ललाट पर स्थान दिया,
तुझे कोटि - कोटि प्रणाम,
तुम में समाये चारों धाम। 

हस्त में त्रिशूल है,
तुझ में सभी मंत्रो का  मूल है, 
तुझे कोटि - कोटि प्रणाम,
जग में केवल सच्चा है शिव का नाम । 

11 फ़रवरी 2015

क्या हो तुम

अधरों पर छनकते स्वरों की लय,
हो तुम।

आँखों में बसे स्नेहिल स्वपन,
हो तुम।

निहारे जिसे  दर्पण एक टक वह मूरत ,
हो तुम। 

आकाश में उड़ती भावनाओं की डोर ,
हो तुम।

सुदूर दिशाओं में गूंजता पर्वतीय गीत ,
हो तुम।

मन में छिपी रहस्यमयी प्रीत ,
हो तुम।

लहरों पर उमड़ता सूर्य प्रकाश ,
हो तुम।

अचल , समूर्ण प्रशांत ,
हो तुम।

शांत हो ,
एकांत हो।

क्या व्याख्यान करूँ ,
क्या वर्णन करूँ ,
सरल हो ,
अविरल हो ,
फिर भी एक पहेली।

कभी भी शायद तुम्हें बता न सकूँ ,
कि मेरे लिए क्या हो तुम...............

08 जनवरी 2015

अगर .........

अगर मैं पुष्प होती ,
तो तुम्हारी राहों में बिछ जाती ,
मेरी सुगंध बस तुम तक ही आती। 

अगर मैं अश्रु होती ,
तो तुम्हारे नयनों से ख़ुशी बन छलकती ,
सर्वस्व तुम्हारी ही प्रसन्नता बन दमकती। 

अगर मैं ब्यार होती ,
तो प्राणवायु बन तुम्हें सहलाती ,
जहाँ भी जाते तुम्हारा साथ मैं पाती। 

अगर मैं धरा होती ,
तो तुम  आसमान का काजल ,
मुझ पर बरस जाते तुम बन बादल। 

अगर मैं वंदना होती ,
तो तुम्हारा ही गुणगान गाती ,
धैर्य और सयंम से तुम्हें सजाती।

अगर मैं नदिया होती ,
तो तुम मेरे प्रशांत ,
तुम में ही समां जाते मेरे दिन - रैन।  

03 जनवरी 2015

हे ! हिमालय तू महान है


ऊँची जिसकी शान है ,
दुनिया में जिसका मान है ,
सदियों से है जो खड़ा हुआ ,
दुश्मनों के सामने अड़ा हुआ ,
हे ! हिमालय तू महान  है। 

प्रकृति के कई  उपहार ,
फूलों की नई बहार ,
ज्ञान के असंख्य भण्डार ,
तुझ में समाये अपरम्पार ,
हे ! हिमालय तू महान  है। 

अशांत मन को शांति ,
निर्जन जीवन को कांति ,
गंगा के प्रवाह को संभालता ,
निस्वार्थ प्रेम उड़ेलता ,
हे ! हिमालय तू महान  है। 

गा न सके कोई तेरी गाथा ,
ईश्वर भी तेरी गोद में समाता ,
पर आज तू है चीखता ,
इंसान जो है तुझको चीरता , 
फिर भी तू है डटा हुआ ,
हे ! हिमालय तू महान  है। 
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