12 अक्तूबर 2014

मैं क्या चाहती हूँ

हूँ तो तुम्हारी भक्तिन, 
पर  तुम्हारी शक्ति बनना चाहती हूँ।  

हूँ तो तुम्हारी चरण धुलि , 
पर तुम्हें माथे लगाना चाहती हूँ।  

हूँ तो मुरझाई कली  सी,
पर  फूल बन तुम्हारी राहों में बिखरना चाहती हूँ। 

हूँ तो ओंस की बूँद भर , 
पर सावन बन तुम पर बरसना चाहती हूँ।  

हूँ तो  कागज का  टुकड़ा बस,
पर  तुम्हारी कहानी लिखना  चाहती हूँ।  

यूँ तो कोई अस्तित्व नहीं है मेरा ,
पर तुझ में समाना चाहती हूँ ,

बिखरा बिखरा सा यह जीवन है ,
तुम को खुद में समेटना चाहती हूँ। 

बंधी है डोर किसी ओर संग, 
पर तुम्हें अपना सर्वस्व समर्पण करना चाहती हूँ। 





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