02 सितंबर 2017

मेरी और तुम्हारी कहानी

मेरी और तुम्हारी कहानी,
एक दिन यह ज़माना पढ़ेगा,
और ना जाने कितनी
कवितायें गढ़ेगा l

हर छन्द में,
नाम होगा मेरा और तुम्हारा,
किसी ना किसी टूटे स्वप्न का,
होगा यह सहारा l


झरने की तरह,
बहती भावों की माला,
सेहलायेगी और,
बुझायेगी पीड़ित हृदय की ज्वाला l

मेरी और तुम्हारी कहानी,
कुछ अनसुनी और कुछ सुनी,
स्नेह की धारा l
                         

डरती हूँ

तुम्हारा नाम लेने से,
डरती हूँ,
की कोई ओर उसे सुन ना  ले। 

             तुम्हारा ज़िक्र करने से,
             डरती हूँ,
            की कोई ओर तुम्हें जान ना ले। 

                       तुम्हें महसूस करने से,
                       डरती हूँ,
                      की कोई ओर वह अहसास छीन ना ले। 

                             तुम्हें याद ना करना,
                             यह मेरे बस की बात नहीं,
                             पर तुम्हें कोई ओर याद करे,
                              इस बात से डरती हूँ। 

                                    एक वरदान हो तुम,
                                    ईश्वर का मुझ पर,
                                   फिर भी ना जाने क्यों डरती  हूँ ?

                                        मेरे ही रहना तुम हमेशा,
                                       यही  ईश्वर से प्राथना करती हूँ । 
                                                        

खाली पन्ने .....

अक्सर खाली पन्नों  पे,
लिखती हूँ तुम्हारा नाम |

क्या कभी इन पन्नों  पर,
तुम्हारे संग जुड़ पायेगा,
मेरा नाम ?
अब पन्नों  की एक किताब,
फड़फड़ा  रही है,
रुआंसे कोने में |

स्याही भी यही पूछती है मुझसे,
क्यूँ लिखती हो उसका नाम,
जिससे  कभी ना जुड़ा तुम्हारा नाम?

18 जनवरी 2017

अविस्मरणीय

जिस तरह देवता को देखे दीप,
रहना चाहूँ मैं भी,
हरदम तुम्हारे समीप। 

श्वांस के सामान स्वचलित,
है इस ह्रदय में,
तुम्हारी ही लौ प्रज्वलित। 

धीमी धीमी  धूप की आंच,
जैसे तपाये सर्दी की सांझ,
मधुर स्मृतियाँ छू जाएं ,
 मेरी हर सांस। 

यादों के घने बादलों में,
धुंध सी समां जाऊं मैं,
ना  और  ना  छोर,
बस मैं और तुम्हारी यादें ,
                                      बहें  अविस्मरणीय.........

14 मई 2016

आदत

हर पल तुम्हें देखने की,
आदत हो गयी है।

तुम्हारी ही यादों में खो जाने की,
आदत हो गयी है।

बादल और चाँद में तुम्हें ढूंढने की,
आदत हो गयी है।

हर राह , हर मोड़ पर तुम्हें पाने की,
आदत हो गयी है।

कुछ लिखूं या न लिखूं ,
बस तुम्हारे बारे में लिखने की,
आदत हो गयी है।

क्या जाने कोई यह वेदना,
जहाँ तुम पास होकर भी दूर नहीं ,
और दूर होकर भी दूर नहीं।

अब तो बस इस तरह जीने की ,
आदत हो गयी है।

27 अक्तूबर 2015

इन पहाड़ों से




इन पहाड़ों से मेरा कुछ अनोखा नाता है ,
इन्हीं का साथ मुझे हर दम सुहाता है। 

अडिग, अखंड, पहाड़ों की छवि मन में उकेरित है ,
न जाने कितने मेरे स्वपन इन पहाड़ों से प्रेरित  हैं। 

पहाड़ी धुन का राग  मन गुनगुनाता है ,
पहाड़ों की सुंदरता में ही जीवन समाता  है। 

अथाह कल्पनायें पनपती इन वादियों में ,
ज्यूँ मद्धम - मद्धम धूप खिले सर्द जाड़ों में। 

पहाड़ बुलाते हैं मुझे हर क्षण ,
ऐसा प्रतीत होता है ,
शायद कुछ मरण - जन्म का  इनसे समझोता है।  

10 जुलाई 2015

ज़रा रुको तो सही

दौड़ रहें  हैं हम सब ,
बचपन से लेकर अब तक।
क्षण भर रुको तो जरा ,
देखो प्रकृति की  छटा।
कितनी मनहर , कितनी निराली ,
चारों तरफ है हरियाली।

फुर्सत के पल ,
बीती कहानी से गए ढल।
ठहरो थोड़ा सा ,
महसूस करो बहती हवा।
शीतलता , मंद बयार की ,
हलकी - हलकी फुहार सी।

जिंदगी तो ढलती जाएगी ,
कभी भी सुकून न पायेगी।
तब अपने मन में झांको ,
ढूंढो उन मासूम पलों को ,
जब स्वछन्द विचरते थे ,
बिना किसी फ़िक्र यूँ ही बहते थे।

ज़रा रुको तो सही.…………………………………

Related Posts Plugin for WordPress, Blogger...