18 January 2017

अविस्मरणीय

जिस तरह देवता को देखे दीप,
रहना चाहूँ मैं भी,
हरदम तुम्हारे समीप। 

श्वांस के सामान स्वचलित,
है इस ह्रदय में,
तुम्हारी ही लौ प्रज्वलित। 

धीमी धीमी  धूप की आंच,
जैसे तपाये सर्दी की सांझ,
मधुर स्मृतियाँ छू जाएं ,
 मेरी हर सांस। 

यादों के घने बादलों में,
धुंध सी समां जाऊं मैं,
ना  और  ना  छोर,
बस मैं और तुम्हारी यादें ,
                                      बहें  अविस्मरणीय.........

14 May 2016

आदत

हर पल तुम्हें देखने की,
आदत हो गयी है।

तुम्हारी ही यादों में खो जाने की,
आदत हो गयी है।

बादल और चाँद में तुम्हें ढूंढने की,
आदत हो गयी है।

हर राह , हर मोड़ पर तुम्हें पाने की,
आदत हो गयी है।

कुछ लिखूं या न लिखूं ,
बस तुम्हारे बारे में लिखने की,
आदत हो गयी है।

क्या जाने कोई यह वेदना,
जहाँ तुम पास होकर भी दूर नहीं ,
और दूर होकर भी दूर नहीं।

अब तो बस इस तरह जीने की ,
आदत हो गयी है।

27 October 2015

इन पहाड़ों से




इन पहाड़ों से मेरा कुछ अनोखा नाता है ,
इन्हीं का साथ मुझे हर दम सुहाता है। 

अडिग, अखंड, पहाड़ों की छवि मन में उकेरित है ,
न जाने कितने मेरे स्वपन इन पहाड़ों से प्रेरित  हैं। 

पहाड़ी धुन का राग  मन गुनगुनाता है ,
पहाड़ों की सुंदरता में ही जीवन समाता  है। 

अथाह कल्पनायें पनपती इन वादियों में ,
ज्यूँ मद्धम - मद्धम धूप खिले सर्द जाड़ों में। 

पहाड़ बुलाते हैं मुझे हर क्षण ,
ऐसा प्रतीत होता है ,
शायद कुछ मरण - जन्म का  इनसे समझोता है।  

10 July 2015

ज़रा रुको तो सही

दौड़ रहें  हैं हम सब ,
बचपन से लेकर अब तक।
क्षण भर रुको तो जरा ,
देखो प्रकृति की  छटा।
कितनी मनहर , कितनी निराली ,
चारों तरफ है हरियाली।

फुर्सत के पल ,
बीती कहानी से गए ढल।
ठहरो थोड़ा सा ,
महसूस करो बहती हवा।
शीतलता , मंद बयार की ,
हलकी - हलकी फुहार सी।

जिंदगी तो ढलती जाएगी ,
कभी भी सुकून न पायेगी।
तब अपने मन में झांको ,
ढूंढो उन मासूम पलों को ,
जब स्वछन्द विचरते थे ,
बिना किसी फ़िक्र यूँ ही बहते थे।

ज़रा रुको तो सही.…………………………………

29 June 2015

तेरा ही नाम

सोते- जागते बस तेरा ही नाम लेती हूँ ,
जब डरती हूँ काली रात से,
तब तेरा ही नाम लेती हूँ। 

बादलों की चादर से छन के आये बारिश ,
भिगो दे मेरी हर ख्वाहिश,
पर हर ख्वाहिश की तकदीर में मैं,
तेरा ही नाम लिख देती हूँ। 



जन्म, पुनर्जन्म होते हैं क्या ?
मुझे नहीं पता। 
यदि होते हैं तो,
हर जन्म में तेरे ही नाम अपना यह जीवन लिख देती हूँ। 

कोई कुछ कहता नहीं मुझसे,
न ही कुछ पूछता है,
क्यूंकि जवाब में मैं,
तेरा ही नाम कह देती हूं,
सोते- जागते बस तेरा ही नाम लेती हूँ । 


27 June 2015

नीलकंठ त्रिपुरारी


नीलकंठ त्रिपुरारी,
तेरी छवि निराली।

त्रिशूल हाथ में धरा,
हरे सबकी व्यथा।

गंगा को लपेटे,
कष्ट सभी के पी लेते। 

सर्प माला से सुसज्जित,
करते सभी का हित्त। 

नंदी की है सवारी,
समग्र सृष्टि तुम्हें प्यारी। 

मुण्डमाल की लड़ियाँ,
मुक्त करें मोहमाया की कड़ियाँ। 

चंदा का आभूषण,
चमके  हर क्षण - क्षण। 

शक्ति है अर्धांगिनी,
सदैव आपकी संगिनी। 

नीलकंठ त्रिपुरारी,
तेरी छवि निराली।


21 June 2015

चाँद की शीतलता

चंदा इक ओर  बैठा,
आकाश में ,
टुकुर- टुकुर निहारे धरती को प्रकाश से,
पर यह प्रकाश उसने उधार लिया है सूर्य से,
फिर भी देखे इक टक सम्पूर्ण धैर्य से। 

गर्वान्वित हो सूर्य चमके,
ओर भी गर्माहट से ,
त्राहि - त्राहि  करे धरती उसकी हर आहट पे,
द्वेष, क्रोध, जलन का परिवेश निराला है,
जिसने भी पिया उसका ह्रदय ज्वलनशील ज्वाला है । 

वहीँ चंदा की शीतलता,
अनोखी है , शांत है,
पृथवी उसकी ठंडक में नितांत हैं। 

बने हम भी चाँद की ठंडक सा,
                   बहें मंद - मंद हवा की सुगंध सा ................... 





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